श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

किं स्वप्न एतदुत देवमाया

किं वा मदीयो बत बुद्धिमोहः।

अथो अमुष्यैव ममार्भकस्य

यः कश्‍चनौत्पत्तिक आत्मयोगः॥ ४०

kiṃ svapna etaduta devamāyā

kiṃ vā madīyo bata buddhimohaḥ|

atho amuṣyaiva mamārbhakasya

yaḥ kaścanautpattika ātmayogaḥ|| 40

अर्थ

वे सोचने लगीं कि ‘यह कोई स्वप्न है या भगवान्‌की माया? कहीं मेरी बुद्धिमें ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया है? सम्भव है, मेरे इस बालकमें ही कोई जन्मजात योगसिद्धि हो’॥ ४०॥

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