श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

महद्विचलनं नॄणां गृहिणां दीनचेतसाम्।

निःश्रेयसाय भगवन् कल्पते नान्यथा क्‍वचित्॥ ४

mahadvicalanaṃ nṝṇāṃ gṛhiṇāṃ dīnacetasām|

niḥśreyasāya bhagavan kalpate nānyathā kvacit|| 4

अर्थ

आप-जैसे महात्माओंका हमारे-जैसे गृहस्थोंके घर आ जाना ही हमारे परम कल्याणका कारण है। हम तो घरोंमें इतने उलझ रहे हैं और इन प्रपंचोंमें हमारा चित्त इतना दीन हो रहा है कि हम आपके आश्रमतक जा भी नहीं सकते। हमारे कल्याणके सिवा आपके आगमनका और कोई हेतु नहीं है॥ ४॥

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