॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.3
सूपविष्टं कृतातिथ्यं गिरा सूनृतया मुनिम्।
नन्दयित्वाब्रवीद् ब्रह्मन् पूर्णस्य करवाम किम्॥ ३
sūpaviṣṭaṃ kṛtātithyaṃ girā sūnṛtayā munim|
nandayitvābravīd brahman pūrṇasya karavāma kim|| 3
अर्थ
जब गर्गाचार्यजी आरामसे बैठ गये और विधिपूर्वक उनका आतिथ्य-सत्कार हो गया, तब नन्दबाबाने बड़ी ही मधुर वाणीसे उनका अभिनन्दन किया और कहा—‘भगवन्! आप तो स्वयं पूर्णकाम हैं, फिर मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ ३॥