श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अहं ममासौ पतिरेष मे सुतो

व्रजेश्‍वरस्याखिलवित्तपा सती।

गोप्यश्‍च गोपाः सहगोधनाश्‍च मे

यन्माययेत्थं कुमतिः स मे गतिः॥ ४२

ahaṃ mamāsau patireṣa me suto

vrajeśvarasyākhilavittapā satī|

gopyaśca gopāḥ sahagodhanāśca me

yanmāyayetthaṃ kumatiḥ sa me gatiḥ|| 42

अर्थ

यह मैं हूँ और ये मेरे पति तथा यह मेरा लड़का है, साथ ही मैं व्रजराजकी समस्त सम्पत्तियोंकी स्वामिनी धर्मपत्‍नी हूँ; ये गोपियाँ, गोप और गोधन मेरे अधीन हैं—जिनकी मायासे मुझे इस प्रकारकी कुमति घेरे हुए है, वे भगवान् ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं—मैं उन्हींकी शरणमें हूँ’॥ ४२॥

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