श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहतं तथा।

नैवातिप्रीयसे विद्वन् धनेषु विदितं हि मे॥ २९

prāyo gṛheṣu te cittamakāmavihataṃ tathā|

naivātiprīyase vidvan dhaneṣu viditaṃ hi me|| 29

अर्थ

मैं जानता हूँ कि आपका चित्त गृहस्थीमें रहनेपर भी प्रायः विषय-भोगोंमें आसक्त नहीं है। विद्वन्! यह भी मुझे मालूम है कि धन आदिमें भी आपकी कोई प्रीति नहीं है॥ २९॥

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