जगत्में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्की मायासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और चित्तमें विषयोंकी तनिक भी वासना न रहनेपर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते हैं॥ ३०॥
केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतसः।
त्यजन्तः प्रकृतीर्दैवीर्यथाहं लोकसङ्ग्रहम्॥ ३०
जगत्में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्की मायासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और चित्तमें विषयोंकी तनिक भी वासना न रहनेपर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते हैं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 622) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/80/30/