श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं संदर्शिता ह्यंग हरिणा भृत्यवश्यता।

स्ववशेनापि कृष्णेन यस्येदं सेश्‍वरं वशे॥ १९

evaṃ saṃdarśitā hyaṃga hariṇā bhṛtyavaśyatā|

svavaśenāpi kṛṣṇena yasyedaṃ seśvaraṃ vaśe|| 19

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण परम स्वतन्त्र हैं। ब्रह्मा, इन्द्र आदिके साथ यह सम्पूर्ण जगत् उनके वशमें है। फिर भी इस प्रकार बँधकर उन्होंने संसारको यह बात दिखला दी कि मैं अपने प्रेमी भक्तोंके वशमें हूँ*॥ १९॥✎ 1411 1412

टिप्पणियाँ

  1. *

    यद्यपि भगवान् स्वयं परमेश्‍वर हैं, तथापि प्रेमपरवश होकर बँध जाना परम चमत्कारकारी होनेके कारण भगवान्‌का भूषण ही है, दूषण नहीं।

    आत्माराम होनेपर भी भूख लगना, पूर्णकाम होनेपर भी अतृप्त रहना, शुद्ध सत्त्वस्वरूप होनेपर भी क्रोध करना, स्वाराज्य-लक्ष्मीसे युक्त होनेपर भी चोरी करना, महाकाल यम आदिको भय देनेवाले होनेपर भी डरना और भागना, मनसे भी तीव्र गतिवाले होनेपर भी माताके हाथों पकड़ा जाना, आनन्दमय होनेपर भी दुःखी होना, रोना, सर्वव्यापक होनेपर भी बँध जाना—यह सब भगवान्‌की स्वाभाविक भक्तवश्यता है। जो लोग भगवान्‌को नहीं जानते हैं, उनके लिये तो इसका कुछ उपयोग नहीं है, परन्तु जो श्रीकृष्णको भगवान्‌के रूपमें पहचानते हैं, उनके लिये यह अत्यन्त चमत्कारी वस्तु है और यह देखकर—जानकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है, भक्तिप्रेमसे सराबोर हो जाता है। अहो! विश्‍वेश्‍वर प्रभु अपने भक्तके हाथों ऊखलमें बँधे हुए हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 188)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1411 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँके → माके
  • #1412 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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