श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नेमं विरिंचो न भवो न श्रीरप्यंगसंश्रया।

प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात्॥ २०

nemaṃ viriṃco na bhavo na śrīrapyaṃgasaṃśrayā|

prasādaṃ lebhire gopī yattat prāpa vimuktidāt|| 20

अर्थ

ग्वालिनी यशोदाने मुक्तिदाता मुकुन्दसे जो कुछ अनिर्वचनीय कृपाप्रसाद प्राप्त किया वह प्रसाद ब्रह्मा पुत्र होनेपर भी, शंकर आत्मा होनेपर भी और वक्षःस्थलपर विराजमान लक्ष्मी अर्धांगिनी होनेपर भी न पा सके, न पा सके†॥ २०॥✎ 1411 1412

टिप्पणियाँ

  1. †

    इस श्‍लोकमें तीनों नकारोंका अन्वय ‘लेभिरे’ क्रियाके साथ करना चाहिये। न पा सके, न पा सके, न पा सके।

    (मुद्रित पृष्ठ 188)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1411 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँके → माके
  • #1412 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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