॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.15.29
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः।
मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा॥ २९
agnyādibhirna hanyeta muneryogamayaṃ vapuḥ|
madyogaśrāntacittasya yādasāmudakaṃ yathā|| 29
अर्थ
जैसे जलके द्वारा जलमें रहनेवाले प्राणियोंका नाश नहीं होता, वैसे ही जिस योगीने अपना चित्त मुझमें लगाकर शिथिल कर दिया है, उसके योगमय शरीरको अग्नि, जल आदि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं कर सकते॥ २९॥