श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तान् रोचमानान् स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान् नव।

पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो नृपः॥ २७

tān rocamānān svarucā brahmaputropamān nava|

papraccha paramaprītaḥ praśrayāvanato nṛpaḥ|| 27

अर्थ

वे नवों योगीश्‍वर अपने अंगोंकी कान्तिसे इस प्रकार चमक रहे थे, मानो साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि मुनीश्‍वर ही हों। राजा निमिने विनयसे झुककर परम प्रेमके साथ उनसे प्रश्‍न किया॥ २७॥

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