श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम्।

स्पर्धाक्रोधः क्षयं निन्ये वैणवोऽग्‍निर्यथा वनम्॥ २४

brahmaśāpopasṛṣṭānāṃ kṛṣṇamāyāvṛtātmanām|

spardhākrodhaḥ kṣayaṃ ninye vaiṇavo'gniryathā vanam|| 24

अर्थ

जैसे बाँसोंकी रगड़से उत्पन्‍न होकर दावानल बाँसोंको ही भस्म कर देता है, वैसे ही ब्रह्मशापसे ग्रस्त और भगवान् श्रीकृष्णकी मायासे मोहित यदुवंशियोंके स्पर्द्धामूलक क्रोधने उनका ध्वंस कर दिया॥ २४॥

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