श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.61

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया।

विमोहितौ दीनधियौ शिशून् पुपुषतुः प्रजाः॥ ६१

snehānubaddhahṛdayāvanyonyaṃ viṣṇumāyayā|

vimohitau dīnadhiyau śiśūn pupuṣatuḥ prajāḥ|| 61

अर्थ

राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्‌की मायासे मोहित हो रहे थे। उनका हृदय एक-दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा था। वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चोंके पालन-पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन-दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती॥ ६१॥

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