मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं। शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली-पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं। तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा-तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है॥ ११॥
आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिंगजटाधरम्।
त्र्यक्षं दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम्॥ ११
मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं। शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली-पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं। तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा-तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 960) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/11/