श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभिः।

न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिनः कुहकं यथा॥ ३०

naitāvatā bhagavataḥ svamāyāmayavṛttibhiḥ|

na duṣyetānubhāvastairmāyinaḥ kuhakaṃ yathā|| 30

अर्थ

जैसे जादूगर अनेकों खेल दिखलाता है और उन खेलोंसे उसके प्रभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, वैसे ही आप अपनी स्वजनमोहिनी मायाकी वृत्तियोंको स्वीकार करके किसीकी वन्दना-स्तुति आदि करते हैं तो केवल इस कामके द्वारा आपकी महिमामें कोई त्रुटि नहीं आती॥ ३०॥

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