आपने स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥
सृष्ट्वेदं मनसा विश्वमात्मनानुप्रविश्य यः।
गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा॥ ३१
आपने स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 962) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/31/