श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.31

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सृष्ट्वेदं मनसा विश्‍वमात्मनानुप्रविश्य यः।

गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा॥ ३१

sṛṣṭvedaṃ manasā viśvamātmanānupraviśya yaḥ|

guṇaiḥ kurvadbhirābhāti karteva svapnadṛg yathā|| 31

अर्थ

आपने स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्‍वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥

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