सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने सुमधुर वाणीसे इस प्रकार भगवान् शंकरकी स्तुति और पूजा की, तब उन्होंने भगवती पार्वतीकी प्रसाद-प्रेरणासे यह बात कही॥ ३५॥
इत्यर्चितोऽभिष्टुतश्च मुनिना सूक्तया गिरा।
तमाह भगवाञ्छर्वः शर्वया चाभिनन्दितः॥ ३५
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने सुमधुर वाणीसे इस प्रकार भगवान् शंकरकी स्तुति और पूजा की, तब उन्होंने भगवती पार्वतीकी प्रसाद-प्रेरणासे यह बात कही॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 963) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/35/