एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्त्र्यक्ष ईश्वरः।✎ 2157
देव्यै तत्कर्म कथयन्ननुभूतं पुरामुना॥ ३८
evaṃ varān sa munaye dattvāgāttryakṣa īśvaraḥ|
devyai tatkarma kathayannanubhūtaṃ purāmunā|| 38
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये॥ ३८॥✎ 1785
एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्त्र्यक्ष ईश्वरः।
देव्यै तत्कर्म कथयन्ननुभूतं पुरामुना॥ ३८
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 963) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/10/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)