सूर्यभगवान्के गणोंमें ऋषिलोग तो सूर्यसम्बन्धी ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं और गंधर्व उनके सुयशका गान करते रहते हैं। अप्सराएँ आगे-आगे नृत्य करती चलती हैं॥ ४७॥✎ 1861
सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैर्ऋषयः संस्तुवन्त्यमुम्।
गन्धर्वास्तं प्रगायन्ति नृत्यन्त्यप्सरसोऽग्रतः॥ ४७
सूर्यभगवान्के गणोंमें ऋषिलोग तो सूर्यसम्बन्धी ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं और गंधर्व उनके सुयशका गान करते रहते हैं। अप्सराएँ आगे-आगे नृत्य करती चलती हैं॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.11.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 969) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/11/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1247 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्षय: → सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्ऋषयः
#1248 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैऋर्ऋषय: → सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिङ्गैर्ऋषयः