श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.5

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

मायाद्यैर्नवभिस्तत्त्वैः स विकारमयो विराट्।

निर्मितो दृश्यते यत्र सचित्के भुवनत्रयम्॥ ५

māyādyairnavabhistattvaiḥ sa vikāramayo virāṭ|

nirmito dṛśyate yatra sacitke bhuvanatrayam|| 5

अर्थ

भगवान्‌के जिस चेतनाधिष्ठित विराट् रूपमें यह त्रिलोकी दिखायी देती है, वह प्रकृति, सूत्रात्मा, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा—इन नौ तत्त्वोंके सहित ग्यारह इन्द्रिय तथा पंचभूत—इन सोलह विकारोंसे बना हुआ है॥ ५॥

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