परीक्षित्! अधिक क्या कहें—कलियुगका अन्त होते-होते मनुष्योंका स्वभाव गधों-जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थीका भार ढोनेवाले और विषयी हो जायँगे। ऐसी स्थितिमें धर्मकी रक्षा करनेके लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे॥ १६॥
इत्थं कलौ गतप्राये जने तु खरधर्मिणि।
धर्मत्राणाय सत्त्वेन भगवानवतरिष्यति॥ १६
परीक्षित्! अधिक क्या कहें—कलियुगका अन्त होते-होते मनुष्योंका स्वभाव गधों-जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थीका भार ढोनेवाले और विषयी हो जायँगे। ऐसी स्थितिमें धर्मकी रक्षा करनेके लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.2.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 913) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/2/16/