श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.16

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इत्थं कलौ गतप्राये जने तु खरधर्मिणि।

धर्मत्राणाय सत्त्वेन भगवानवतरिष्यति॥ १६

itthaṃ kalau gataprāye jane tu kharadharmiṇi|

dharmatrāṇāya sattvena bhagavānavatariṣyati|| 16

अर्थ

परीक्षित्! अधिक क्या कहें—कलियुगका अन्त होते-होते मनुष्योंका स्वभाव गधों-जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थीका भार ढोनेवाले और विषयी हो जायँगे। ऐसी स्थितिमें धर्मकी रक्षा करनेके लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे॥ १६॥

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