श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यावत् स पादपद्माभ्यां स्पृशन्‍नास्ते रमापतिः।

तावत् कलिर्वै पृथिवीं पराक्रान्तुं न चाशकत्॥ ३०

yāvat sa pādapadmābhyāṃ spṛśannāste ramāpatiḥ|

tāvat kalirvai pṛthivīṃ parākrāntuṃ na cāśakat|| 30

अर्थ

जबतक लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीका स्पर्श करते रहे, तबतक कलियुग पृथ्वीपर अपना पैर न जमा सका॥ ३०॥✎ 1924

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1924 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परम-धामको → परमधामको

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