श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.13

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ममतां मय्यवर्तन्त कृत्वोच्चैर्मर्त्यधर्मिणः।

कथावशेषाः कालेन ह्यकृतार्थाः कृता विभो॥ १३

mamatāṃ mayyavartanta kṛtvoccairmartyadharmiṇaḥ|

kathāvaśeṣāḥ kālena hyakṛtārthāḥ kṛtā vibho|| 13

अर्थ

पृथु, पुरूरवा, गाधि, नहुष, भरत, सहस्रबाहु, अर्जुन, मान्धाता, सगर, राम, खट्वांग, धुन्धुमार, रघु, तृणबिन्दु, ययाति, शर्याति, शन्तनु, गय, भगीरथ, कुवलयाश्‍व, ककुत्स्थ, नल, नृग, हिरण्यकशिपु, वृत्रासुर, लोकद्रोही रावण, नमुचि, शम्बर, भौमासुर, हिरण्याक्ष और तारकासुर तथा और बहुत-से दैत्य एवं शक्तिशाली नरपति हो गये। ये सब लोग सब कुछ समझते थे, शूर थे, सभीने दिग्विजयमें दूसरोंको हरा दिया; किन्तु दूसरे लोग इन्हें न जीत सके, परन्तु सब-के-सब मृत्युके ग्रास बन गये। राजन्! उन्होंने अपने पूरे अन्तःकरणसे मुझसे ममता की और समझा कि ‘यह पृथ्वी मेरी है’। परन्तु विकराल कालने उनकी लालसा पूरी न होने दी। अब उनके बल-पौरुष और शरीर आदिका कुछ पता ही नहीं है। केवल उनकी कहानी मात्र शेष रह गयी है॥ ९—१३॥

यह अर्थ श्लोक 9–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें