श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.19

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सन्तुष्टाः करुणा मैत्राः शान्ता दान्तास्तितिक्षवः।

आत्मारामाः समदृशः प्रायशः श्रमणा२ जनाः॥ १९

santuṣṭāḥ karuṇā maitrāḥ śāntā dāntāstitikṣavaḥ|

ātmārāmāḥ samadṛśaḥ prāyaśaḥ śramaṇā janāḥ|| 19

अर्थ

सत्ययुगके लोग बड़े सन्तोषी और दयालु होते हैं। वे सबसे मित्रताका व्यवहार करते और शान्त रहते हैं। इन्द्रियाँ और मन उनके वशमें रहते हैं और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंको वे समान भावसे सहन करते हैं। अधिकांश लोग तो समदर्शी और आत्माराम होते हैं और बाकी लोग स्वरूप-स्थितिके लिये अभ्यासमें तत्पर रहते हैं॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    सुमहाजनाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 919)

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