॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.3.18
श्रीशुक उवाच
कृते प्रवर्तते धर्मश्चतुष्पात्तज्जनैर्धृतः१।
सत्यं दया तपो दानमिति पादा विभोर्नृप॥ १८
kṛte pravartate dharmaścatuṣpāttajjanairdhṛtaḥ|
satyaṃ dayā tapo dānamiti pādā vibhornṛpa|| 18
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सत्ययुगमें धर्मके चार चरण होते हैं; वे चरण हैं—सत्य, दया, तप और दान। उस समयके लोग पूरी निष्ठाके साथ अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं। धर्म स्वयं भगवान्का स्वरूप है॥ १८॥
टिप्पणियाँ
- १
ष्यादो जनै०।