॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.3.8
ममैवेयं मही कृत्स्ना न ते मूढेति वादिनः।
स्पर्धमाना मिथो घ्नन्ति म्रियन्ते मत्कृते नृपाः॥ ८
mamaiveyaṃ mahī kṛtsnā na te mūḍheti vādinaḥ|
spardhamānā mitho ghnanti mriyante matkṛte nṛpāḥ|| 8
अर्थ
वे परस्पर इस प्रकार कहते हैं कि ‘ओ मूढ़! यह सारी पृथ्वी मेरी ही है, तेरी नहीं’, इस प्रकार राजा लोग एक-दूसरेको कहते-सुनते हैं, एक-दूसरेसे स्पर्द्धा करते हैं, मेरे लिये एक-दूसरेको मारते हैं और स्वयं मर मिटते हैं॥ ८॥