॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.31
यथा हिरण्यं बहुधा समीयते१
नृभिः क्रियाभिर्व्यवहारवर्त्मसु।
एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजो
व्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जनैः॥ ३१
yathā hiraṇyaṃ bahudhā samīyate
nṛbhiḥ kriyābhirvyavahāravartmasu|
evaṃ vacobhirbhagavānadhokṣajo
vyākhyāyate laukikavaidikairjanaiḥ|| 31
अर्थ
जैसे व्यवहारमें मनुष्य एक ही सोनेको अनेकों रूपोंमें गढ़-गलाकर तैयार कर लेते हैं और वह कंगन, कुण्डल, कड़ा आदि अनेकों रूपोंमें मिलता है; इसी प्रकार व्यवहारमें निपुण विद्वान् लौकिक और वैदिक वाणीके द्वारा इन्द्रियातीत आत्मस्वरूप भगवान्का भी अनेकों रूपोंमें वर्णन करते हैं॥ ३१॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रतीयते।