॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.32
यथा घनोऽर्कप्रभवोऽर्कदर्शितो
ह्यर्कांशभूतस्य च चक्षुषस्तमः।
एवं त्वहं ब्रह्मगुणस्तदीक्षितो
ब्रह्मांशकस्यात्मन आत्मबन्धनः॥ ३२
yathā ghano'rkaprabhavo'rkadarśito
hyarkāṃśabhūtasya ca cakṣuṣastamaḥ|
evaṃ tvahaṃ brahmaguṇastadīkṣito
brahmāṃśakasyātmana ātmabandhanaḥ|| 32
अर्थ
देखो न, बादल सूर्यसे उत्पन्न होता है और सूर्यसे ही प्रकाशित। फिर भी वह सूर्यके ही अंश नेत्रोंके लिये सूर्यका दर्शन होनेमें बाधक बन बैठता है। इसी प्रकार अहंकार भी ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता, ब्रह्मसे ही प्रकाशित होता और ब्रह्मके अंश जीवके लिये ब्रह्मस्वरूपके साक्षात्कारमें बाधक बन बैठता है॥ ३२॥