श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.33

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

घनो यदार्कप्रभवो विदीर्यते

चक्षुः स्वरूपं रविमीक्षते तदा।

यदा ह्यहंकार उपाधिरात्मनो

जिज्ञासया नश्यति तर्ह्यनुस्मरेत्॥ ३३

ghano yadārkaprabhavo vidīryate

cakṣuḥ svarūpaṃ ravimīkṣate tadā|

yadā hyahaṃkāra upādhirātmano

jijñāsayā naśyati tarhyanusmaret|| 33

अर्थ

जब सूर्यसे प्रकट होनेवाला बादल तितर-बितर हो जाता है, तब नेत्र अपने स्वरूप सूर्यका दर्शन करनेमें समर्थ होते हैं। ठीक वैसे ही, जब जीवके हृदयमें जिज्ञासा जगती है, तब आत्माकी उपाधि अहंकार नष्ट हो जाता है और उसे अपने स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है॥ ३३॥

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