श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.34

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यदैवमेतेन विवेकहेतिना

मायामयाहंकरणात्मबन्धनम् ।

छित्त्वाच्युतात्मानुभवोऽवतिष्ठते

तमाहुरात्यन्तिकमंग सम्प्लवम्॥ ३४

yadaivametena vivekahetinā

māyāmayāhaṃkaraṇātmabandhanam |

chittvācyutātmānubhavo'vatiṣṭhate

tamāhurātyantikamaṃga samplavam|| 34

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! जब जीव विवेकके खड्गसे मायामय अहंकारका बन्धन काट देता है, तब यह अपने एकरस आत्मस्वरूपके साक्षात्कारमें स्थित हो जाता है। आत्माकी यह मायामुक्त वास्तविक स्थिति ही आत्यन्तिक प्रलय कही जाती है॥ ३४॥

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