श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.40

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

संसारसिन्धुमतिदुस्तरमुत्तितीर्षो-

र्नान्यः प्लवो भगवतः पुरुषोत्तमस्य।

लीलाकथारसनिषेवणमन्तरेण

पुंसो भवेद् विविधदुःखदवार्दितस्य॥ ४०

saṃsārasindhumatidustaramuttitīrṣo-

rnānyaḥ plavo bhagavataḥ puruṣottamasya|

līlākathārasaniṣevaṇamantareṇa

puṃso bhaved vividhaduḥkhadavārditasya|| 40

अर्थ

जो लोग अत्यन्त दुस्तर संसार-सागरसे पार जाना चाहते हैं अथवा जो लोग अनेकों प्रकारके दुःख-दावानलसे दग्ध हो रहे हैं, उनके लिये पुषोत्तमभगवान्‌की लीला-कथारूप रसके सेवनके अतिरिक्त और कोई साधन, कोई नौका नहीं है। ये केवल लीला-रसायनका सेवन करके ही अपना मनोरथ सिद्ध कर सकते हैं॥ ४०॥

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