श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.5

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

द्विपरार्धे त्वतिक्रान्ते ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।

तदा प्रकृतयः सप्त कल्पन्ते प्रलयाय वै॥ ५

dviparārdhe tvatikrānte brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ|

tadā prakṛtayaḥ sapta kalpante pralayāya vai|| 5

अर्थ

इस प्रकार रातके बाद दिन और दिनके बाद रात होते-होते जब ब्रह्माजीकी अपने मानसे सौ वर्षकी और मनुष्योंकी दृष्टिमें दो परार्द्धकी आयु समाप्त हो जाती है, तब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा—ये सातों प्रकृतियाँ अपने कारण मूल प्रकृतिमें लीन हो जाती हैं॥ ५॥

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