श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.8

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न तत्रात्मा स्वयंज्योतिर्यो व्यक्ताव्यक्तयोः परः।

आकाश इव चाधारो ध्रुवोऽनन्तोपमस्ततः॥ ८

na tatrātmā svayaṃjyotiryo vyaktāvyaktayoḥ paraḥ|

ākāśa iva cādhāro dhruvo'nantopamastataḥ|| 8

अर्थ

परन्तु जैसे दीपकके बुझ जानेसे तत्त्वरूप तेजका विनाश नहीं होता, वैसे ही संसारका नाश होनेपर भी स्वयंप्रकाश आत्माका नाश नहीं होता। क्योंकि वह कार्य और कारण, व्यक्त और अव्यक्त सबसे परे है, वह आकाशके समान सबका आधार है, नित्य और निश्‍चल है, वह अनन्त है। सचमुच आत्माकी उपमा आत्मा ही है॥ ८॥

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