परीक्षित्की परमगति, जनमेजयका सर्पसत्र और वेदोंके शाखाभेद
सूत उवाच
एतन्निशम्य मुनिनाभिहितं परीक्षिद्
व्यासात्मजेन निखिलात्मदृशा समेन।
तत्पादमूलमुपसृत्य नतेन मूर्ध्ना
बद्धांजलिस्तमिदमाह स विष्णुरातः॥ १
etanniśamya muninābhihitaṃ parīkṣid
vyāsātmajena nikhilātmadṛśā samena|
tatpādamūlamupasṛtya natena mūrdhnā
baddhāṃjalistamidamāha sa viṣṇurātaḥ|| 1
अर्थ
श्रीसूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! व्यासनन्दन श्रीशुकदेव मुनि समस्त चराचर जगत्को अपनी आत्माके रूपमें अनुभव करते हैं और व्यवहारमें सबके प्रति समदृष्टि रखते हैं। भगवान्के शरणागत एवं उनके द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित्ने उनका सम्पूर्ण उपदेश बड़े ध्यानसे श्रवण किया। अब वे सिर झुकाकर उनके चरणोंके तनिक और पास खिसक आये तथा अंजलि बाँधकर उनसे यह प्रार्थना करने लगे॥ १॥
एतन्निशम्य मुनिनाभिहितं परीक्षिद्
व्यासात्मजेन निखिलात्मदृशा समेन।
तत्पादमूलमुपसृत्य नतेन मूर्ध्ना
बद्धांजलिस्तमिदमाह स विष्णुरातः॥ १
श्रीसूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! व्यासनन्दन श्रीशुकदेव मुनि समस्त चराचर जगत्को अपनी आत्माके रूपमें अनुभव करते हैं और व्यवहारमें सबके प्रति समदृष्टि रखते हैं। भगवान्के शरणागत एवं उनके द्वारा सुरक्षित राजर्षि परीक्षित्ने उनका सम्पूर्ण उपदेश बड़े ध्यानसे श्रवण किया। अब वे सिर झुकाकर उनके चरणोंके तनिक और पास खिसक आये तथा अंजलि बाँधकर उनसे यह प्रार्थना करने लगे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 932) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/6/1/