श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.32

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद्

यन्‍नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा

हृदोपगुह्यावसितं समाहितैः॥ ३२

paraṃ padaṃ vaiṣṇavamāmananti tad

yanneti netītyatadutsisṛkṣavaḥ|

visṛjya daurātmyamananyasauhṛdā

hṛdopaguhyāvasitaṃ samāhitaiḥ|| 32

अर्थ

जो मुमुक्षु एवं विचारशील पुरुष परमपदके अतिरिक्त वस्तुका परित्याग करते हुए ‘नेति-नेति’ के द्वारा उसका निषेध करके ऐसी वस्तु प्राप्त करते हैं, जिसका कभी निषेध नहीं हो सकता और न तो कभी त्याग ही, वही विष्णुभगवान्‌का परमपद है; यह बात सभी महात्मा और श्रुतियाँ एक मतसे स्वीकार करती हैं। अपने चित्तको एकाग्र करनेवाले पुरुष अन्तःकरणकी अशुद्धियोंको, अनात्म-भावनाओंको सदा-सर्वदाके लिये मिटाकर अनन्य प्रेमभावसे परिपूर्ण हृदयके द्वारा उसी परमपदका आलिंगन करते हैं और उसीमें समा जाते हैं॥ ३२॥

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