॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.33
त एतदधिगच्छन्ति विष्णोर्यत् परमं पदम्।
अहं ममेति दौर्जन्यं न येषां देहगेहजम्॥ ३३
ta etadadhigacchanti viṣṇoryat paramaṃ padam|
ahaṃ mameti daurjanyaṃ na yeṣāṃ dehagehajam|| 33
अर्थ
विष्णुभगवान्का यही वास्तविक स्वरूप है, यही उनका परमपद है। इसकी प्राप्ति उन्हीं लोगोंको होती है, जिनके अन्तःकरणमें शरीरके प्रति अहंभाव नहीं है और न तो इसके सम्बन्धी गृह आदि पदार्थोंमें ममता ही। सचमुच जगत्की वस्तुओंमें मैंपन और मेरेपनका आरोप बहुत बड़ी दुर्जनता है॥ ३३॥