शौनकजी! अब याज्ञवल्क्यने सोचा कि मैं ऐसी श्रुतियाँ प्राप्त करूँ, जो मेरे गुरुजीके पास भी न हों। इसके लिये वे सूर्यभगवान्का उपस्थान करने लगे॥ ६६॥
याज्ञवल्क्यस्ततो ब्रह्मन् छन्दांस्यधिगवेषयन्।
गुरोरविद्यमानानि सूपतस्थेऽर्कमीश्वरम्॥ ६६
शौनकजी! अब याज्ञवल्क्यने सोचा कि मैं ऐसी श्रुतियाँ प्राप्त करूँ, जो मेरे गुरुजीके पास भी न हों। इसके लिये वे सूर्यभगवान्का उपस्थान करने लगे॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/6/66/