॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.67
याज्ञवल्क्य उवाच
ॐ नमो भगवते आदित्यायाखिलजगतामात्मस्वरूपेण कालस्वरूपेण चतुर्विधभूतनिकायानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामन्तर्हृदयेषु बहिरपि चाकाश इवोपाधिनाव्यवधीयमानो भवानेक एव क्षणलवनिमेषावयवोपचितसंवत्सरगणेनापामादानविसर्गाभ्यामिमां लोकयात्रामनुवहति॥ ६७॥✎ 1543 1544 1545
oṃ namo bhagavate ādityāyākhilajagatāmātmasvarūpeṇa kālasvarūpeṇa caturvidhabhūtanikāyānāṃ brahmādistambaparyantānāmantarhṛdayeṣu bahirapi cākāśa ivopādhināvyavadhīyamāno bhavāneka eva kṣaṇalavanimeṣāvayavopacitasaṃvatsaragaṇenāpāmādānavisargābhyāmimāṃ lokayātrāmanuvahati|| 67||
अर्थ
याज्ञवल्क्यजी इस प्रकार उपस्थान करते हैं—मैं ॐकारस्वरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा और कालस्वरूप हैं। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—चार प्रकारके प्राणी हैं, उन सबके हृदयदेशमें और बाहर आकाशके समान व्याप्त रहकर भी आप उपाधिके धर्मोंसे असंग रहनेवाले अद्वितीय भगवान् ही हैं। आप ही क्षण, लव, निमेष आदि अवयवोंसे संघटित संवत्सरोंके द्वारा एवं जलके आकर्षण-विकर्षण—आदान-प्रदानके द्वारा समस्त लोकोंकी जीवनयात्रा चलाते हैं॥ ६७॥