कहीं मतवाले भौंरे अपनी संगीतमयी गुंजारसे लोगोंका मन आकर्षित करते रहते हैं तो कहीं मतवाले कोकिल पंचम स्वरमें ‘कुहू-कुहू’ कूकते रहते हैं; कहीं मतवाले मोर अपने पंख फैलाकर कलापूर्ण नृत्य करते रहते हैं तो कहीं अन्य मतवाले पक्षियोंका झुंड खेलता रहता है॥ १९॥
मत्तभ्रमरसंगीतं मत्तकोकिलकूजितम्।
मत्तबर्हिनटाटोपं मत्तद्विजकुलाकुलम्॥ १९
कहीं मतवाले भौंरे अपनी संगीतमयी गुंजारसे लोगोंका मन आकर्षित करते रहते हैं तो कहीं मतवाले कोकिल पंचम स्वरमें ‘कुहू-कुहू’ कूकते रहते हैं; कहीं मतवाले मोर अपने पंख फैलाकर कलापूर्ण नृत्य करते रहते हैं तो कहीं अन्य मतवाले पक्षियोंका झुंड खेलता रहता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 948) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/8/19/