श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.19

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मत्तभ्रमरसंगीतं मत्तकोकिलकूजितम्।

मत्तबर्हिनटाटोपं मत्तद्विजकुलाकुलम्॥ १९

mattabhramarasaṃgītaṃ mattakokilakūjitam|

mattabarhinaṭāṭopaṃ mattadvijakulākulam|| 19

अर्थ

कहीं मतवाले भौंरे अपनी संगीतमयी गुंजारसे लोगोंका मन आकर्षित करते रहते हैं तो कहीं मतवाले कोकिल पंचम स्वरमें ‘कुहू-कुहू’ कूकते रहते हैं; कहीं मतवाले मोर अपने पंख फैलाकर कलापूर्ण नृत्य करते रहते हैं तो कहीं अन्य मतवाले पक्षियोंका झुंड खेलता रहता है॥ १९॥

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