श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.20

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

वायुः प्रविष्ट आदाय हिमनिर्झरशीकरान्।

सुमनोभिः परिष्वक्तो ववावुत्तम्भयन् स्मरम्॥ २०

vāyuḥ praviṣṭa ādāya himanirjharaśīkarān|

sumanobhiḥ pariṣvakto vavāvuttambhayan smaram|| 20

अर्थ

मार्कण्डेय मुनिके ऐसे पवित्र आश्रममें इन्द्रके भेजे हुए वायुने प्रवेश किया। वहाँ उसने पहले शीतल झरनोंकी नन्हीं-नन्हीं फुहियाँ संग्रह कीं। इसके बाद सुगन्धित पुष्पोंका आलिंगन किया और फिर कामभावको उत्तेजित करते हुए धीरे-धीरे बहने लगा॥ २०॥

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