मार्कण्डेय मुनिके ऐसे पवित्र आश्रममें इन्द्रके भेजे हुए वायुने प्रवेश किया। वहाँ उसने पहले शीतल झरनोंकी नन्हीं-नन्हीं फुहियाँ संग्रह कीं। इसके बाद सुगन्धित पुष्पोंका आलिंगन किया और फिर कामभावको उत्तेजित करते हुए धीरे-धीरे बहने लगा॥ २०॥
वायुः प्रविष्ट आदाय हिमनिर्झरशीकरान्।
सुमनोभिः परिष्वक्तो ववावुत्तम्भयन् स्मरम्॥ २०
मार्कण्डेय मुनिके ऐसे पवित्र आश्रममें इन्द्रके भेजे हुए वायुने प्रवेश किया। वहाँ उसने पहले शीतल झरनोंकी नन्हीं-नन्हीं फुहियाँ संग्रह कीं। इसके बाद सुगन्धित पुष्पोंका आलिंगन किया और फिर कामभावको उत्तेजित करते हुए धीरे-धीरे बहने लगा॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 948) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/8/20/