कामदेवके प्यारे सखा वसन्तने भी अपनी माया फैलायी। सन्ध्याका समय था। चन्द्रमा उदित हो अपनी मनोहर किरणोंका विस्तार कर रहे थे। सहस्र-सहस्र डालियोंवाले वृक्ष लताओंका आलिंगन पाकर धरतीतक झुके हुए थे। नयी-नयी कोपलों, फलों और फूलोंके गुच्छे अलग ही शोभायमान हो रहे थे॥ २१॥
उद्यच्चन्द्रनिशावक्त्रः प्रवालस्तबकालिभिः।
गोपद्रुमलताजालैस्तत्रासीत् कुसुमाकरः॥ २१
कामदेवके प्यारे सखा वसन्तने भी अपनी माया फैलायी। सन्ध्याका समय था। चन्द्रमा उदित हो अपनी मनोहर किरणोंका विस्तार कर रहे थे। सहस्र-सहस्र डालियोंवाले वृक्ष लताओंका आलिंगन पाकर धरतीतक झुके हुए थे। नयी-नयी कोपलों, फलों और फूलोंके गुच्छे अलग ही शोभायमान हो रहे थे॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 948) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/8/21/