कभी-कभी वह तिरछी चितवनसे इधर-उधर देख लिया करती थी। उसके नेत्र कभी गेंदके साथ आकाशकी ओर जाते, कभी धरतीकी ओर और कभी हथेलियोंकी ओर। वह बड़े हाव-भावके साथ गेंदकी ओर दौड़ती थी। उसी समय उसकी करधनी टूट गयी और वायुने उसकी झीनी-सी साड़ीको शरीरसे अलग कर दिया॥ २७॥
इतस्ततो भ्रमद्दृष्टेश्चलन्त्या अनुकन्दुकम्।
वायुर्जहार तद्वासः सूक्ष्मं त्रुटितमेखलम्॥ २७
कभी-कभी वह तिरछी चितवनसे इधर-उधर देख लिया करती थी। उसके नेत्र कभी गेंदके साथ आकाशकी ओर जाते, कभी धरतीकी ओर और कभी हथेलियोंकी ओर। वह बड़े हाव-भावके साथ गेंदकी ओर दौड़ती थी। उसी समय उसकी करधनी टूट गयी और वायुने उसकी झीनी-सी साड़ीको शरीरसे अलग कर दिया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 949) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/8/27/