जब मार्कण्डेय मुनिने देखा कि भगवान्के साक्षात् स्वरूप नर-नारायण ऋषि पधारे हैं, तब वे बड़े आदरभावसे उठकर खड़े हो गये और धरतीपर दण्डवत् लोटकर साष्टांग प्रणाम किया॥ ३५॥
ते वै भगवतो रूपे नरनारायणावृषी।
दृष्ट्वोत्थायादरेणोच्चैर्ननामांगेन दण्डवत्॥ ३५
जब मार्कण्डेय मुनिने देखा कि भगवान्के साक्षात् स्वरूप नर-नारायण ऋषि पधारे हैं, तब वे बड़े आदरभावसे उठकर खड़े हो गये और धरतीपर दण्डवत् लोटकर साष्टांग प्रणाम किया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 950) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/8/35/