॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.36
स तत्सन्दर्शनानन्दनिर्वृतात्मेन्द्रियाशयः।
हृष्टरोमाश्रुपूर्णाक्षो न सेहे तावुदीक्षितुम्॥ ३६
sa tatsandarśanānandanirvṛtātmendriyāśayaḥ|
hṛṣṭaromāśrupūrṇākṣo na sehe tāvudīkṣitum|| 36
अर्थ
भगवान्के दिव्य दर्शनसे उन्हें इतना आनन्द हुआ कि उनका रोम-रोम, उनकी सारी इन्द्रियाँ एवं अन्तःकरण शान्तिके समुद्रमें गोता खाने लगे। शरीर पुलकित हो गया। नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये, जिनके कारण वे उन्हें भर आँख देख भी न सकते॥ ३६॥