॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.40
मार्कण्डेय उवाच
किं वर्णये तव विभो यदुदीरितोऽसुः
संस्पन्दते तमनु वाङ्मनइन्द्रियाणि।
स्पन्दन्ति वै तनुभृतामजशर्वयोश्च
स्वस्याप्यथापि भजतामसि भावबन्धुः॥ ४०
kiṃ varṇaye tava vibho yadudīrito'suḥ
saṃspandate tamanu vāṅmanaïndriyāṇi|
spandanti vai tanubhṛtāmajaśarvayośca
svasyāpyathāpi bhajatāmasi bhāvabandhuḥ|| 40
अर्थ
मार्कण्डेय मुनिने कहा—भगवन्! मैं अल्पज्ञ जीव भला, आपकी अनन्त महिमाका कैसे वर्णन करूँ? आपकी प्रेरणासे ही सम्पूर्ण प्राणियों—ब्रह्मा, शंकर तथा मेरे शरीरमें भी प्राणशक्तिका संचार होता है और फिर उसीके कारण वाणी, मन तथा इन्द्रियोंमें भी बोलने, सोचने-विचारने और करने-जाननेकी शक्ति आती है। इस प्रकार सबके प्रेरक और परम स्वतन्त्र होनेपर भी आप अपना भजन करनेवाले भक्तोंके प्रेम-बन्धनमें बँधे हुए हैं॥ ४०॥