श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.43

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नान्यं तवाङ्‌घ्र्युपनयादपवर्गमूर्तेः ✎ 1903

क्षेमं जनस्य परितोभिय ईश विद्मः।

ब्रह्मा बिभेत्यलमतो द्विपरार्धधिष्ण्यः

कालस्य ते किमुत तत्कृतभौतिकानाम्॥ ४३

nānyaṃ tavāṅghryupanayādapavargamūrteḥ

kṣemaṃ janasya paritobhiya īśa vidmaḥ|

brahmā bibhetyalamato dviparārdhadhiṣṇyaḥ

kālasya te kimuta tatkṛtabhautikānām|| 43

अर्थ

प्रभो! जीवके चारों ओर भय-ही-भयका बोलबाला है। औरोंकी तो बात ही क्या, आपके कालरूपसे स्वयं ब्रह्मा भी अत्यन्त भयभीत रहते हैं; क्योंकि उनकी आयु भी सीमित—केवल दो परार्धकी है। फिर उनके बनाये हुए भौतिक शरीरवाले प्राणियोंके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है। ऐसी अवस्थामें आपके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करनेके अतिरिक्त और कोई भी परम कल्याण तथा सुख-शान्तिका उपाय हमारी समझमें नहीं आता; क्योंकि आप स्वयं ही मोक्षस्वरूप हैं॥ ४३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1903 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तवांङ्‌घ्रॺपनयाद → तवाङ्‌घ्र्युपनयाद

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