श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.44

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तद् वै भजाम्यृतधियस्तव पादमूलं

हित्वेदमात्मच्छदि चात्मगुरोः परस्य।

देहाद्यपार्थमसदन्त्यमभिज्ञमात्रं

विन्देत ते तर्हि सर्वमनीषितार्थम्॥ ४४

tad vai bhajāmyṛtadhiyastava pādamūlaṃ

hitvedamātmacchadi cātmaguroḥ parasya|

dehādyapārthamasadantyamabhijñamātraṃ

vindeta te tarhi sarvamanīṣitārtham|| 44

अर्थ

भगवन्! आप समस्त जीवोंके परम गुरु, सबसे श्रेष्ठ और सत्य ज्ञानस्वरूप हैं। इसलिये आत्मस्वरूपको ढक देनेवाले देह-गेह आदि निष्फल, असत्य, नाशवान् और प्रतीतिमात्र पदार्थोंको त्याग कर मैं आपके चरणकमलोंकी ही शरण ग्रहण करता हूँ। कोई भी प्राणी यदि आपकी शरण ग्रहण कर लेता है तो वह उससे अपने सारे अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कर लेता है॥ ४४॥

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