॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.45
सत्त्वं रजस्तम इतीश तवात्मबन्धो
मायामयाः स्थितिलयोदयहेतवोऽस्य।
लीला धृता यदपि सत्त्वमयी प्रशान्त्यै
नान्ये नृणां व्यसनमोहभियश्च याभ्याम्॥ ४५✎ 1243
sattvaṃ rajastama itīśa tavātmabandho
māyāmayāḥ sthitilayodayahetavo'sya|
līlā dhṛtā yadapi sattvamayī praśāntyai
nānye nṛṇāṃ vyasanamohabhiyaśca yābhyām|| 45
अर्थ
जीवोंके परम सुहृद् प्रभो! यद्यपि सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण आपकी ही मूर्ति हैं—इन्हींके द्वारा आप जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, लय आदि अनेकों मायामयी लीलाएँ करते हैं फिर भी आपकी सत्त्वगुणमयी मूर्ति ही जीवोंको शान्ति प्रदान करती है। रजोगुणी और तमोगुणी मूर्तियोंसे जीवोंको शान्ति नहीं मिल सकती। उनसे तो दुःख, मोह और भयकी वृद्धि ही होती है॥ ४५॥