sa kadācid bhramaṃstasmin pṛthivyāḥ kakudi dvijaḥ|
nyagrodhapotaṃ dadṛśe phalapallavaśobhitam|| 20
अर्थ
शौनकजी! मार्कण्डेय मुनि इसी प्रकार प्रलयके जलमें बहुत समयतक भटकते रहे। एक बार उन्होंने पृथ्वीके एक टीलेपर एक छोटा-सा बरगदका पेड़ देखा। उसमें हरे-हरे पत्ते और लाल-लाल फल शोभाय-मान हो रहे थे॥ २०॥
स कदाचिद् भ्रमंस्तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि द्विजः।
न्यग्रोधपोतं ददृशे फलपल्लवशोभितम्॥ २०
शौनकजी! मार्कण्डेय मुनि इसी प्रकार प्रलयके जलमें बहुत समयतक भटकते रहे। एक बार उन्होंने पृथ्वीके एक टीलेपर एक छोटा-सा बरगदका पेड़ देखा। उसमें हरे-हरे पत्ते और लाल-लाल फल शोभाय-मान हो रहे थे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/20/