श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.31

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि प्ररूढं

वटं च तत्पर्णपुटे शयानम्।

तोकं च तत्प्रेमसुधास्मितेन

निरीक्षितोऽपांगनिरीक्षणेन ॥ ३१

tasmin pṛthivyāḥ kakudi prarūḍhaṃ

vaṭaṃ ca tatparṇapuṭe śayānam|

tokaṃ ca tatpremasudhāsmitena

nirīkṣito'pāṃganirīkṣaṇena || 31

अर्थ

अब फिर उन्होंने देखा कि समुद्रके बीचमें पृथ्वीके टीलेपर वही बरगदका पेड़ ज्यों-का-त्यों विद्यमान है और उसके पत्तेके दोनेमें वही शिशु सोया हुआ है। उसके अधरोंपर प्रेमामृतसे परिपूर्ण मन्द-मन्द मुसकान है और अपनी प्रेमपूर्ण चितवनसे वह मार्कण्डेयजीकी ओर देख रहा है॥ ३१॥

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