अब मार्कण्डेय मुनि इन्द्रियातीत भगवान्को जो शिशुके रूपमें क्रीडा कर रहे थे और नेत्रोंके मार्गसे पहले ही हृदयमें विराजमान हो चुके थे, आलिंगन करनेके लिये बड़े श्रम और कठिनाईसे आगे बढ़े॥ ३२॥
अथ तं बालकं वीक्ष्य नेत्राभ्यां धिष्ठितं हृदि।
अभ्ययादतिसंक्लिष्टः परिष्वक्तुमधोक्षजम्॥ ३२
अब मार्कण्डेय मुनि इन्द्रियातीत भगवान्को जो शिशुके रूपमें क्रीडा कर रहे थे और नेत्रोंके मार्गसे पहले ही हृदयमें विराजमान हो चुके थे, आलिंगन करनेके लिये बड़े श्रम और कठिनाईसे आगे बढ़े॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 958) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/9/32/